तो लो जी, बन गए सीएम केजरीवाल। काल का पहिया पिछले साल जहां से 14 फरवरी को घूमा था, इस साल वहीं आकर रुक गया। लगा कि एक साल का वनवास काटकर केजरीवाल सीएम
की
कुर्सी पर लौट आए हैं। यह इत्तफाक हो सकता है कि जिस दिन कुर्सी छोड़ी थी,
उसी दिन वापस मिली है लेकिन तब और अब में बड़ा बदलाव आ गया है। उस बदलाव
को केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी दोनों ही महसूस कर रहे हैं। अब यह आम
पार्टी नहीं खास पार्टी हो गई है। जो पार्टी 70 में से 67 सीटें जीतकर अपने
सारे विरोधियों को धूल चटा दे, वह आम नहीं रह जाती, खास हो ही जाती है।इस बार बहुत कुछ बदला हुआ है। उम्मीदवारों के चयन से लेकर अब शपथ ग्रहण करने तक नजारे बदले नजर आते हैं। 2013 के चुनाव में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार जमीन से जुड़े वॉलंटियर ही थे। इस बार ऐसा नहीं हुआ। 'आप' के 44 उम्मीदवार तो करोड़पति थे। दूसरी पार्टियों से आए लोगों का स्वागत भी हुआ और अगले ही दिन टिकट से भी नवाज दिया गया। अगर उनके खिलाफ कुछ मामले भी दर्ज हैं तो कोई गुरेज नहीं। शांति भूषण जैसे नेता की मानें तो अन्य पार्टियों की तरह 'आप' के टिकट बेचे गए। बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें तो होती ही रहती हैं। चुनाव के दौरान 'आप' उम्मीदवार भी प्रचार में पीआर एजेंसियां हायर करते नजर आए। चुनाव, लोकतंत्र और सत्ता के प्रति उनका नजरिया भी बदला-बदला नजर आया। चुनाव लड़ना और जीतना भी उन्होंने सीख लिया है और क्या खूब सीखा है कि सारे विरोधी उड़न-छू हो गए। चुनाव प्रचार के दौरान इस बार 'आप' उतनी नेगेटिव नजर नहीं आई। दूसरी पार्टियों के नेताओं पर आरोप लगाकर 'हिट एंड रन' करते भी नजर नहीं आए। बीजेपी को अपनी पॉजिटिविटी से इतना चिढ़ा दिया कि वे बौखलाकर केजरीवाल पर आक्रमण-दर-आक्रमण कर बैठे। केजरीवाल को अब आरोपों का गुस्से से जवाब देने की बजाय हंसते हुए खामोश रहना भी आ गया। इससे केजरीवाल के प्रति हमदर्दी और संवेदना पैदा हुई, जिसका बदलाव वोटों के रूप में हुआ।
'आप' में अब आम आदमी जैसा दिखने की प्रवृति भी कम हुई है। पिछली बार की वह धक्कमपेल याद है न जब केजरीवाल शपथ ग्रहण के लिए मेट्रो से निकले थे। लोगों के लिए सांस लेना भी दूभर हो गया था। इस बार केजरीवाल और उनके साथी गाड़ी से आए और वैसे ही शपथ ली जैसे कांग्रेस और बीजेपी के मुख्यमंत्री अन्य राज्यों में लेते हैं। इस बार ऐसी कोई जिद भी नहीं है कि हम न कार लेंगे और न ही बंगला लेंगे। सिक्यॉरिटी पर ना-नुकुर जरूर है, लेकिन मंत्री जी अब गाड़ी और बंगलों का इस्तेमाल करेंगे - अपने लिए नहीं दूसरों के लिए। जिस मीडिया ने हाथों-हाथ लिया था, सचिवालय में उस मीडिया की एंट्री ही बंद करा दी है। यह ट्रांसपेरंट गवर्नेंस का अच्छा तरीका है। पत्रकार अंदर आएंगे तो मीन-मेख भी निकालेंगे। उन्हें इसका मौका ही मत दो। 'आप' से वीआईपी बनने का कुछ असर तो दिखना ही चाहिए। अब वादों का 'सही अर्थ' बताना भी 'आप' नेताओं को आ गया है। पूरी दिल्ली को वाई-फाई करने का मतलब नासमझ लोगों ने यह निकाला था कि अब मोबाइल का खर्च आधा रह जाएगा। अब साफ कर दिया गया है कि सिर्फ पब्लिक प्लेस पर ही फ्री वाई-फाई होगा और वह भी 20 मिनट के लिए। बिजली का बिल आधा करने पर भी अब स्पष्टीकरण आने लगे हैं। अब पिछली बार की तरह कोई जल्दबाजी भी नहीं है। पिछली बार 49 दिनों में 49 बार इस्तीफा देने की धमकी दी थी लेकिन अब 5 साल शासन चलाने का वादा है। वादों को जल्दबाजी में पूरा करने की कोई समय सीमा भी नहीं है। हो भी क्यों? आखिर 'आप' अब शासन चलाना सीख गई है, यह भी तो एक बदलाव है - ठीक उसी तरह जो बदलाव केजरीवाल के विज्ञापनों में नजर आया, मफलरमैन से हटकर एक नया जेंटल लुक।


