पिछली बार यानी 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजे आने तक यह नहीं मालूम था कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनेगी तो कौन मुख्यमंत्री बनेगा. चुनावी नतीजे जब समाजवादी पार्टी के पक्ष में आए तो हर ओर से यही बात आई कि इसका काफी हद तक श्रेय मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव को जाता है. अखिलेश ने उन चुनावों के दौरान जो साइकिल यात्रा की थी, उसके बारे में माना गया कि उससे सपा के पक्ष में माहौल बना. यही वजह है कि मुलायम सिंह यादव खुद पीछे हट गए और उन्होंने देश के सबसे बड़े सूबे का मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ही बनाया. कुल मिलाकर देखा जाए तो 2012 के चुनावों में हर अर्थों में अखिलेश असली विजेता बनकर उभरे थे.
पांच साल बाद यानी 2017 के विधानसभा चुनावों में उनकी पत्नी और सपा सांसद डिंपल यादव के बारे में भी ऐसा ही कहा जा सकता है. यानी उत्तर प्रदेश चुनाव में बाजी चाहे जिसके हाथ लगे, लेकिन असली विजेता के तौर पर डिंपल यादव उभरती दिख रही हैं.
अखिलेश जब मुख्यमंत्री बने थे तो जो लोकसभा सीट खाली हुई उसी सीट से डिंपल लोकसभा सांसद बनीं. इन चुनावों के पहले तक उनकी पहचान अखिलेश यादव की पत्नी के तौर पर थी. अब भी उनकी यह पहचान बनी हुई है. लेकिन इन चुनावों में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान भी बनाई है. डिंपल की सभाओं में भारी भीड़ उमड़ी और सपा नेताओं की मानें तो प्रत्याशियों की ओर से अपने क्षेत्र में चुनाव प्रचार के लिए सबसे अधिक मांग जिन नेताओं की हुई, उनमें डिंपल यादव भी एक हैं. एक सपा प्रवक्ता ने बताया कि पार्टी का तकरीबन हर प्रत्याशी यह चाह रहा था कि उसके क्षेत्र में डिंपल की एक सभा जरूर हो जाए.
उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी को चलाने वाले परिवार में कुछ समय पहले तक जो घमासान चल रहा था उसने सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पार्टी के शीर्ष पर स्थापित कर दिया. वे अपने पिता मुलायम सिंह यादव को हटाकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष के पद पर काबिज हो गए. अखिलेश के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले उनके चाचा शिवपाल यादव अब सपा में हाशिये पर चले गए हैं. मुलायम सिंह का साथ अखिलेश को अक्सर खटकने वाले अमर सिंह के काम भी नहीं आया और अब वे भी पार्टी से बाहर हैं.
इस पूरी उठापटक में अखिलेश निर्विवाद तौर पर सपा में नंबर एक के तौर पर स्थापित हो गए हैं. जब तक मुलायम सिंह यादव पार्टी के सर्वेसर्वा थे तब तक माना जाता था कि अखिलेश और शिवपाल दोनों नंबर दो हैं. लेकिन अब जब शिवपाल यादव इस स्थिति में नहीं हैं तो सवाल उठता है कि सपा की नई व्यवस्था में दूसरे नंबर पर कौन है.
इसका जवाब है डिंपल यादव. समाजवादी पार्टी के शीर्ष पर अखिलेश यादव के पहुंच जाने के बाद से पार्टी में जो स्थितियां बनी हैं, उनमें उनकी पत्नी और पार्टी सांसद डिंपल यादव ही नई नंबर दो हैं. न सिर्फ वे इन चुनावों में सपा के पोस्टरों में प्रमुखता से मौजूद दिखीं बल्कि पहली बार बड़े पैमाने पर उनकी भी सभाएं हुईं. पहले सपा की रैलियों में आने वाले पार्टी समर्थक मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के नारे लगाते थे. लेकिन इस बार सपा की रैलियों में अखिलेश और डिंपल यादव के नारे लगे. ऐसी रैलियों में दो नारे बड़े चर्चित रहे और बार—बार सुने गए– ‘भैया का विकास है, भाभी जी का साथ है’ और ‘विकास की चाभी, डिंपल भाभी.’ कांग्रेस के साथ सपा का गठबंधन होने के बाद से एक तरफ पूरे सूबे में अखिलेश यादव और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के पोस्टर लगे तो दूसरी तरफ ऐसे पोस्टरों की भी कमी नहीं थी जिनमें प्रमुखता से अखिलेश और डिंपल दिख रहे थे.
सपा की सियासत की अखिलेश की योजना में डिंपल की अहम भूमिका होगी, इसका संकेत सार्वजनिक तौर पर तो अखिलेश यादव ने उस वीडियो में ही दे दिया था जिसमें वे, उनकी पत्नी और उनके बच्चे दिखे थे. उस वीडियो के जारी होने से पहले चुनाव प्रबंधन का काम देखने वाले एक सज्जन की मुलाकात अखिलेश यादव से हुई थी. उनके मुताबिक इस मुलाकात में अखिलेश ने उनसे पूछा कि सपा को फिर से चुनाव जीतने के लिए नया क्या करना चाहिए. जवाब में उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को कहा कि सपा के चुनाव अभियान में डिंपल यादव की अहम भूमिका होनी चाहिए. क्योंकि जिस तरह से अखिलेश की छवि साफ-सुथरी है, उसी तरह की छवि डिंपल यादव की भी है. यह सुनकर अखिलेश कुछ बोले नहीं बल्कि हल्की सी मुस्कान उनके चेहरे पर उभरी. सलाह देने वाले व्यक्ति ने संकेत समझ लिया.
राजनीतिक जानकार डिंपल यादव को सपा के चुनाव अभियान में विशेष अहमियत दिए जाने को एक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं. सपा के बारे में कहा जाता है कि उसके राज में कानून व्यवस्था का हाल ठीक नहीं रहता. इस छवि की वजह से कुछ खास वर्ग की महिलाओं को छोड़कर बाकी महिलाओं को लगता है कि सपा की सरकार उनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए ठीक नहीं है. लेकिन डिंपल को आगे करके अखिलेश ने महिलाओं के बीच सपा को लेकर भरोसे की इस कमी को पाटने की कोशिश की. वे महिलाओं को यह यकीन दिलाने की कोशिश कर रहे थे कि अब सपा में निर्णय लेने वालों में शीर्ष स्तर पर डिंपल यादव जैसी महिला भी होंगी, इसलिए वे निश्चिंत होकर सपा को वोट दे सकती हैं.
डिंपल की सक्रियता के और भी कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. यह कहा जा रहा है अभी तक के सपा के सफर में कोई महिला बहुत अहम भूमिका में नहीं रही. लंबे समय तक पार्टी मुलायम सिंह के सहारे चलते रही और बाद में अखिलेश और शिवपाल इसे चलाते रहे. परिवार से बाहर के जो नेता सपा में बेहद ताकतवर रहे उनमें अमर सिंह और आजम खान का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है. जिन नामों का जिक्र यहां किया गया है, उनके बराबर की कोई महिला नेता कभी सपा में नहीं रही.
लेकिन अब डिंपल उस कमी को भरती नजर आ रही हैं. कुछ राजनीतिक जानकार यह भी मान रहे हैं कि सपा में डिंपल यादव की अहम भूमिका हो जाने से न सिर्फ पार्टी में महिला नेता की कमी पूरी हो रही है बल्कि इससे बहुजन समाज पार्टी की मायावती का मुकाबला करने में भी उसे कुछ मदद मिल सकती है. मायावती अक्सर अपने चुनाव प्रचार में खुद के दलित और महिला होने की बात करके अपने पक्ष में जनसमर्थन जुटाने की कोशिश करती हैं.
अभी भले ही कांग्रेस और सपा एक गठबंधन में हों, लेकिन उत्तर प्रदेश के सभी गैर कांग्रेसी दलों के मन में यह बात भी है कि अगर कभी कांग्रेस ने पूरी तरह से प्रियंका गांधी को मैदान में उतार दिया तो क्या होगा! ऐसे में यह माना जा रहा है अखिलेश यादव डिंपल को आगे करके ऐसी किसी संभावना के प्रति अपनी तैयारी भी मजबूत कर रहे हैं. अगर आम लोगों के बीच उत्तर प्रदेश में डिंपल मजबूत होती हैं तो कांग्रेस को भी प्रियंका को आगे करने से पहले कई बार सोचना पड़ेगा.
इन चुनावों में भी प्रियंका गांधी के अमेठी और रायबरेली से बाहर चुनाव प्रचार करने की संभावनाएं जताई जा रही थीं. लेकिन प्रियंका ने ऐसा नहीं किया. राजनीतिक जानकार इसकी कई वजहों में एक डिंपल यादव की बड़ी सभाओं को भी मान रहे हैं. कहा जा रहा है कि कहीं न कहीं कांग्रेस के रणनीतिकारों को लग गया कि अगर प्रियंका की सभा डिंपल की सभा की तरह नहीं हो पाई तो यह न सिर्फ प्रियंका के लिए बल्कि कांग्रेस के लिए भी सियासी तौर पर ठीक नहीं होगा.
सपा में डिंपल यादव के उभार से यह भी सुनिश्चित हो गया है कि चाहे मुलायम सिंह यादव के दूसरे बेटे प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव कितनी भी कोशिश क्यों न करें, लेकिन परिवार से राजनीति में आने वाली महिलाओं में डिंपल ही शीर्ष पर रहेंगी. अपर्णा लखनऊ कैंट से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ीं और उनका मुकाबला कांग्रेस से भारतीय जनता पार्टी में आईं रीता बहुगुणा जोशी से है.
अपनी चुनावी सभाओं में डिंपल यादव ने वह योग्यता भी दिखाई जो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में सियासत करने के लिए बेहद अहम मानी जाती है. उन्होंने आसानी से समझ आने वाली हिंदी के जरिये अपनी सभाओं में आने वाले लोगों से नाता जोड़ा. उनकी बोलने की शैली से भी लोग प्रभावित दिखे. अपने सधे अंदाज में न सिर्फ उन्होंने अखिलेश सरकार की कामयाबियों को गिनाने का काम किया बल्कि विरोधियों पर भी बेहद सौम्यता से हमले बोले. कहा तो यह भी जा रहा है कि चाहे चुनावों के नतीजे जो भी हों, लेकिन चुनाव अभियानों में डिंपल के प्रदर्शन और उनमें छिपी संभावनाओं को देखते हुए चुनावों के बाद अखिलेश पार्टी में उनकी भूमिका औपचारिक तौर पर बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं.


