चांद का मुंह टेढ़ा है। मुक्तिबोध की मशहूर कविता। इसकी कुछ पंक्तियों पर गौर करिए-
सूनी-सूनी गलियों में
ग़रीबों के ठाँव में--
चौराहे पर खड़े हुए
भैरों की सिन्दूरी
गेरुई मूरत के पथरीले व्यंग्य स्मित पर
टेढ़े-मुँह चांद की ऐयारी रोशनी,
तिलिस्मी चांद की राज़-भरी झाइयाँ !
कुछ
कठिन है न। यकीनन कठिन ही है। इस रहस्य को समझना कि चांद का मुंह टेढ़ा
क्यों है? आखिर मुक्तिबोध क्या कहना चाहते हैं। थोड़ा पढ़ा और थोड़ा जाना
तो समझ आया। वे यथार्थ के कवि थे। वही लिखते थे जो जीते थे। बिम्ब भी समाज
से ही उठाते थे। रात, डर, खौफ, खून और चांद जैसे। दरअसल, कवि कहना चाहता है
कि जो चीज जैसी दिखती है, वह जरूरी नहीं वैसी ही हो। दूर से दिखने वाली
चीजें होती ही ऐसी हैं। दिखती कुछ हैं और होती कुछ।
माफ
कीजिए। शुरुआत में ही भटक गया। दरअसल, लिखना कुछ और चाह रहा था। कवि,
कविता, कवित्व और मुक्तिबोध। इनके बारे में ऐसी समझ नहीं कि कीबोर्ड
गिटपिटाऊं। लिखना चाह रहा था कि चांद उल्टा कैसे हो सकता है और याद आ गई
मुक्तिबोध की कविता। हुआ यूं कि भूकंप के बाद यूपी-बिहार के गांव, कस्बों
और शहरों में अफवाहें फैलीं कि चांद उल्टा निकला है। आज कयामत की रात है।
घर, मकान, बिल्डिंग, नदी, नाले और तालाब सब उलट जाएंगे। तबाही आने वाली है।
एक
मित्र का वॉट्सअप मैसेज आया। उसने लिखा था कि शाम ढलते ही हजारों लोग
आसमान ताक रहे हैं। सबका दावा था कि चांद उल्टा निकला है। मैसेज देखते ही
मुझे कुछ साल पहले का किस्सा याद आ गया कि गणेश जी दूध पी रहे हैं। ऐसी
अफवाह फैली कि भारत के गांव शहरों में ही नहीं, दुनिया के कई मुल्कों में
लोग गणेश जी को दूध पिलाने में लग गए। यह तो समझ आ चुका था कि इस बार भी यह
शरारती लोगों का काम है। एक सवाल यह भी था कि यह किसी कंपनी ने भारत के
बाजार को समझने की साजिश तो नहीं रच दी। भाई कुछ भी हो सकता है। लोगों की
मानसिकता समझ आ जाए तो फिर क्या प्रॉडक्ट और क्या सरकार। आप कुछ भी कामयाबी
से लॉन्च कर सकते हैं। खैर कंपनियों का तो पता नहीं पर लोकल चोर-बदमाशों
ने इसका फायदा जरूर उठाया। कई जगह चोरियां हुईं और कहीं-कहीं तो घर के बाहर
लेटे लोगों के साथ हादसे भी हुए। हत्या और रेप तक।
डर
ही इतना ज्यादा था। घर के सामने वाले पार्क में रात एक बजे छोटे-छोटे
बच्चे रो रहे थे पर उनके मम्मी-पापा घर जाने को तैयार नहीं। उन्हें बताया
कि भाई सब झूठ है। कोई तबाही नहीं आ रही, पर लोग थे कि उल्टा चांद दिखा रहे
थे। खैर क्या करता। डरे हुए लोगों के आगे माथा फोड़ने का कोई मतलब नहीं
था। हां पर एक बात जरूर समझ आ गई। साठ-सत्तर साल पहले मुक्तिबोध के दौर में
और आज के वक्त में कोई खास बदलाव नहीं आया।
चांद
का मुंह टेढ़ा है जैसी कविता और चांद उल्टा हो गया जैसी अफवाह के बीच वाले
दौर में आदमी चांद तक हो आया। फिर भी अच्छे-खासे लोगों की समझ का स्तर
वहीं का वहीं है। पुराने वक्त में लोग चांद में महबूबा से लेकर मामा तक
देखते थे, क्योंकि तब मालूम नहीं था कि वास्तव में चांद बिना हवा-पानी के
बदसूरत और भयानक जगह है। आज जब सब मालूम है तब चांद के उल्टा हो जाने से
डरते हैं। तबाही के अंदेशे से खौफज़दा रहते हैं। आज इंटरनेट है, मोबाइल है,
वॉट्सऐप, फेसबुक और टि्वटर है। इनसे दुनिया न जाने क्या-क्या सीखती है। पर
हम सीखते हैं कि चांद उल्टा है। क्या कहूं। समझ पाना मुश्किल है।
मुक्तिबोध की कविताओं की तरह लोगों की सोच भी कम जटिल नहीं।
चांद का मुंह टेढ़ा है कविता की इन लाइनों की तरह-
बारह का वक़्त है,
भुसभुसे उजाले का फुसफुसाता षड्यन्त्र
शहर में चारों ओर;
ज़माना भी सख्त है !!


