लेखक -शिवम भट्ट
पत्रकार… नेता, ब्यूरोक्रेट्स के बाद देश की संघीय व्यवस्था में अनाधिकारिक तौर पर इन्हें ही रखा जाता है और पत्रकारिता के पेशे को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। सही बात भी है, पत्रकार और पत्रकारिता की बदौलत ही आम लोगों तक वह जानकारी पहुंचती है जिसे सरकारी पन्नों में दबाने की पुरजोर कोशिश की जाती है।
आज देश आजाद है। हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं और अभिव्यक्ति की आजादी की बात कर रहे हैं, तो उसके लिए भी हमें पत्रकारों और अखबारों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए। आजादी के आंदोलन, उससे जुड़ीं खबरों और बदलाव की अलख को देश के कोने-कोने में आग की तरह फैलाने का काम इन्हीं अखबारों और पत्रकारों ने किया था।
लेकिन क्या आज पत्रकारिता का स्वरूप भी वैसा ही है, जैसा पहले हुआ करता था? नहीं, आज पत्रकार कोई लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं है। वह बस करोड़ों-अरबों के एक बड़े बाजार का हिस्सा है। आज के पत्रकार को इससे मतलब नहीं है कि मणिपुर जैसे राज्य में इन दिनों आपातकाल जैसे हालात हैं। उसे और लगभग सभी मीडिया संस्थानों को मतलब है तो सिर्फ इसमें कि गुरमेहर कौर को किसने-कितनी धमकियां दीं, बवाल में एबीवीपी वाले के ज्यादा लातें पड़ीं या AISA वाले के, गुजरात के गधे और यूपी के गधे में अंतर क्या है, राहुल बाबा ने नारियल बोला था या नारंगी?
इन दिनों पत्रकार या पत्रकार बनने की कोशिश करने वालों में एक अजब होड़ सी देखने को मिल रही है। होड़ आगे निकलने की, होड़ खुद को ज्यादा बौद्धिक साबित करने की, होड़ है अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने की और उन्हें फील गुड कराने की। होड़ है एक नकली और फर्जी भौकाल को मेनटेन रखने की और अपने उस संस्थान को खुश रखने की जो किसी विशेष विचारधारा में विश्वास रखता हो। हालांकि, शुक्र है सोशल मीडिया का, जिसने एक-एक कर इन सारे कथित वामपंथी और कथित राष्ट्रवादी पत्रकारों की जमात को अलग-अलग कर देखने में आसानी कर दी।
भारतीय पत्रकारिता में गणेश शंकर विद्यार्थी का एक खास महत्व है। जिस समय वह पत्रकारिता कर रहे थे, उस वक्त की पत्रकारिता किसी भी मायने में आज के जैसी नहीं थी। इसकी दो वजहें हैं, एक तो उस वक्त देश आजादी की जंग लड़ रहा था और पत्रकारिता का उस जंग में खास महत्व था। दूसरी वजह यह थी कि उस वक्त पत्रकारिता बाजार और विज्ञापनों के भरोसे नहीं थी, उस वक्त रीडर्स खबरों में किसी तरह का रस नहीं ढूंढ़ते थे।
उन दिनों पत्रकारों और अखबार के मालिकों पर विज्ञापनों के लिए और अखबार को जिंदा रखने के लिए किसी नेता की चिरौरी करने का दबाव नहीं होता था। गणेश शंकर विद्यार्थी को हमें सिर्फ पत्रकारिता के दिग्गज के तौर पर नहीं याद करना चाहिए, बल्कि वह उससे कहीं आगे एक इंसान थे। वह इंसान, जिन्होंने कानपुर में हिंदू-मुस्लिम दंगे के दौरान दोनों पक्षों को समझाने का पुरजोर प्रयास किया और इसी कोशिश में उनकी जान चली गई। भीड़ ने बीच सड़क पर उन्हें मौत के घाट उतार दिया।
क्या हम आजकल के किसी ‘सुपरस्टार’ पत्रकार से उम्मीद कर सकते हैं कि वह दंगों के दौरान भीड़ के बीच उतरे और उन्हें जाकर समझाए? नहीं, आज ये सुपरस्टार पत्रकार ट्विटर और फेसबुक पर बैठकर लाशों का हिंदू और मुसलमान में अलग-अलग बंटवारा करेंगे। ये यह तय करेंगे कि दंगों के पीछे जिम्मेदार शख्स किस धर्म से ताल्लुक रखता है।
इनके हौसले की पम्पिंग करने का काम करते हैं देश के कुछ बड़े राजनेता, जो भले ही सीएम-मंत्री कुछ भी बन जाएं मगर ओछी हरकतें करना नहीं छोड़ते। ये पत्रकार के नाम पर ‘झुनझुना टाइम्स’ के स्ट्रिंगर की बात भी मान लेंगे, बशर्ते कि वह उनके विरोधी के बारे में कुछ सनसनीखेज दावा कर रहा हो।
लेकिन पत्रकारिता की इस दुर्गति के लिए क्या सिर्फ ‘झुनझुना टाइम्स’ जैसे ब्रैंड्स के फर्जी पत्रकार और कुछ ‘सुपरस्टार’ पत्रकार ही जिम्मेदार हैं? नहीं, इसमें आप पाठकों की भूमिका सबसे अहम है। आपको कोई हक नहीं बनता है पत्रकारों को तब तक गाली देने का, जब तक आप खुद अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते। आपको कोई मतलब नहीं है कि देश-समाज में कहीं दूर गुमनामी में कोई व्यक्ति किस तरह कुछ लोगों की जिंदगी बदल रहा है। आप खाक ध्यान नहीं देते हो ऐसी खबरों पर।
आपको मतलब है तो सेक्स, क्लीवेज, पॉलिटिकल गाली-गलौज, क्राइम से जुड़ी खबरों से। आपको अखबार 5 रुपए में ही चाहिए और 200 रुपए में महीने भर 100 चैनल देखने हैं, तो कैसे आप ईमानदार पत्रकारिता की उम्मीद रख सकते हो? इसलिए या तो खुद को बदलिए, या इन ‘झुनझुना टाइम्स’ जैसे ब्रैंड्स और ‘सुपरस्टार’ पत्रकारों की पत्रकारिता में ही फंसे रहिए।
डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं




