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डिजिटल अर्थव्यवस्था और इंटरनेट पर एकतरफा लगाम लगाने की कोशिशें साथ-साथ नहीं चल सकतीं

एक रिपोर्ट बता रही है कि भारतीय डेस्कटॉप छोड़कर फोन की तरफ बढ़ रहे हैं. लेकिन क्या वे एक-दूसरे से बात कर रहे हैं? वेब के जादुई आकर्षण से बच पाना अब किसी के लिए भी मुमकिन नहीं. यही बात एक दूसरे वेब या जाल के बारे में भी कही जा सकती है जो पूरी दुनिया में फैल चुका है. स्टैटकाउंटर नामक संस्था की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि बीते फरवरी के दौरान दुनिया में मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों का 79 फीसदी हिस्सा भारत से था. इस लिहाज से जी20 देशों में भारत पहले स्थान पर आ गया है.
हालांकि इस आंकड़े पर हैरत नहीं होनी चाहिए. सिर्फ इसलिए नहीं कि हमारे प्रधानमंत्री खुद तकनीक के बहुत शौकीन और सेल्फी प्रेमी हैं. नवंबर 2016 में सरकार ने दो बड़े नोट बंद करके देश को डिजिटलीकरण की दिशा में एक बड़ा धक्का दिया था. नकदी के भारी संकट के चलते लोगों को मजबूरन डिजिटल लेन-देन की तरफ बढ़ना पड़ा. जरूरत के वक्त जरा सा भी मदद हर किसी के लिए मायने रखती है. नोटबंदी से कुछ महीने पहले पहले ही दिग्गज कंपनी रिलायंस ने देश को तेज स्पीड वाली मुफ्त मोबाइल इंटरनेट सेवा की पेशकश कर दी. देखते ही देखते 10 करोड़ ग्राहक अपनी झोली में कर उसने कीमतों के मामले में ऐसा युद्ध छेड़ दिया जिसके नतीजे में डेटा की कीमतें 20 फीसदी नीचे आ गईं.
लेकिन क्या भारतीयों को डेस्कटॉप छोड़ मोबाइल की तरफ बढ़ने के लिए यही दो कारण हैं? एक तीसरा कारण चीन भी हो सकता है. चीनी मोबाइल कंपनियों ने भारतीयों का दिल जीत लिया है. ऐसा उन्होंने बड़ी स्क्रीनों, बेहतर इंटरफेस और स्थानीय भाषाओं में इनपुट जैसी सुविधा वाले मोबाइल बनाकर किया है. इनका उत्पादन भारत में ही करके उन्होंने इनकी कीमत भी काफी कम कर दी है.
लेकिन एक तरफ सब तक पहुंच आसान हो गई है तो दूसरी ओर इंसान, इंसान से दूर होता जा रहा है. इंटरनेट का गलत इस्तेमाल असामाजिक बर्ताव के नतीजे के रूप में दिख रहा है. दुनिया आपस में पहले से ज्यादा जुड़ गई है लेकिन अवसाद और अकेलापन जैसी समस्याएं बढ़ गई हैं. ऊपर से पर्सनलाइज्ड सर्च रिजल्ट्स और न्यूजफीड जैसी सुविधाओं ने हमें एक ऐसे चेंबर में कैद कर दिया है जहां हमें अपनी ही अनुगूंज सुनाई देती है. सूचना-तकनीक लोगों को ऐसी सूचनाओं की दिशा में ले जा रही है जो उनके पूर्वाग्रहों को तुष्ट करती है. अगर कोई विचार इसको भेद भी ले तो उस पर ट्रोल्स की फौज टूट पड़ती है. हिंसा ऑनलाइन होती जा रही दुनिया का एक और साइडइफेक्ट है.
लेकिन भारतीय जब ‘राष्ट्र विरोधी’ पोस्टों पर ट्रोल नहीं कर रहे होते तो वे क्या कर रहे होते हैं? निश्चित तौर पर वे प्रेम की खोज कर रहे होते हैं. लेकिन अमर प्रेम की नहीं. यह भी एक अजीब बात है कि रिश्तों को लेकर रूढिवादी सोच रखने वाले देश में आंकड़े बता रहे हैं कि टिंडर जैसे डेटिंग प्लेटफॉर्म मेट्रिमोनियल वेबसाइटों से ज्यादा मशहूर हो रहे हैं जो पुरानी पीढी को डेस्कटॉप से चिपकाए रखते थे. हालांकि ऐसा नहीं है कि डेस्कटॉप की प्रासंगिकता पूरी तरह से खत्म हो चुकी हो. दफ्तर में काम करते हुए लोग ऑनलाइन शॉपिंग कहां करेंगे?
डिजिटलीकरण और कैशलेस अर्थव्यवस्था पर इस कदर जोर के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है. सरकार अगर अपनी मर्जी से इंटरनेट की सुविधा देने या न देने का काम करेगी तो इसका असर सिर्फ सूचना और अभिव्यक्ति की आजादी पर ही नहीं पड़ेगा जिसे सुप्रीम कोर्ट ने हर नागरिक का अधिकार बताया है. स्वतंत्रता दिवस पर जम्मू-कश्मीर या पाटीदार आंदोलन के दौरान गुजरात का उदाहरण बताता है कि इंटरनेट तक लोगों की पहुंच रोकने के पीछे का मकसद लोगों का एक दूसरे से संवाद रोकना होता है. लेकिन डिजिटल हो रहे भारत में इस तरह का कदम पूरी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डाल सकता है. बीते 12 महीनों में इंटरनेट खासकर मोबाइल इंटरनेट बंद होने के चलते भारत को 96.8 करोड़ का नुकसान हुआ. कैशलेस इकॉनॉमी में एकतरफा बैन की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. डिजिटल दुनिया के नागरिक भारतीयों के लिए इंटरनेट तक निर्बाध पहुंच एक सामान्य बात होनी चाहिए. (स्रोत)


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