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ऑनलाइन शॉपिंग में गोलगप्पे वाले बरबाद


हमें पढ़ाया गया था कि अधिक जनसंख्या अभिशाप होती है। पर वक्त बदल लिया है, अब के बच्चे इस विषय पर यह लिख सकते हैं कि बड़ी जनसंख्या वरदान है। 127 करोड़ के मुल्क के दो परसेंट लोग भी यानी करीब ढाई करोड़ लोग भी इस शॉपिंग फेस्टिवल में शापिंग कर लें, तो समझो कि फिनलैंड सरीखे मुल्कों की कुल आबादी के पांच गुने बंदे शॉपिंग मचा गए।

ऑनलाइन शॉपिंग खूब मच रही है, फेस्टिवल हो या नहीं।

मेरे परिचय की एक महिला-शॉपर कह रही थीं-देख्खोजी, असी ते साड़ी, सूट, लपस्टिक, ब्लाउज, शॉल, स्वेटर, क्रीम-शीम सभी कुछ ऑनलाइन ले लेते हैं। कहीं जाते ही नहीं खरीदने। उन्होंने एक बुनियादी सवाल यह उठाया कि जब कहीं जाना ही नहीं कुछ खरीदने, तो इत्ती साड़ी-सूड़ी खरीदने की जरूरत क्या है। सिंपल से दो-एक साड़ी-सूट में घर बैठकर पिज्जा-बर्गर भर की ऑनलाइन-होमडिलीवरी शॉपिंग कर लो।

कहीं जाना ही नहीं है, तो इत्ते तमाम आइटम चाहिए क्यों। बात में दम है। अब तो बहुत बंदे घर से ही काम कर लेते हैं, उसका भुगतान बैंक में आ जाता है।

काम या शॉपिंग के लिए कहीं जाना ही नहीं।

ऑनलाइन वालो, इत्ता ऑनलाइन ना मचा दो कि बंदा घर से निकले ही ना। ऑनलाइन पर अब सब कुछ मिल जाता है, जो ना मांगो वह भी मिल जाता है। किसी वेबसाइट पर जाओ, तो बिना मांगे कोई रोजीना विल्सन या मार्थरा रॉबर्ट की विंडो कूदकर आ जाती हैं और बताती हैं कि डीयरेस्ट मैं अकेली हूं। मुझसे बात करने के लिए मेसेज करें। इस तरह की विंडोज में मैं पहले मेसेज लिख दिया करता था-आप अकेली हैं, तो दिल्ली पुलिस को सूचित करें। खतरा है। पर अब शहर के हालात देखकर लग रहा है कि खतरा खत्म करना दिल्ली पुलिस के बूते की बात नहीं है।

खैर एक खास मसला-ए-ऑनलाइन शॉपिंग यह है कि तमाम पुराने बाजारों के तमाम गोलगप्पे, चाट-पकौड़ी वाले उदास हैं। वो कहते हैं कि लेडीज लोग और उनकी आड़ में उनसे ज्यादा जेंट्स लोग शापिंग के बाद गोलगप्पे, चाट-पकौड़ी खाते थे। सब तरफ ऑनलाइन शॉपिंग फुलटू मच जाएगी, तो ऑफलाइन गोलगप्पे कौन खाएगा।

सवाल चिंतनीय है, ऑनलाइन में गोलगप्पों का भविष्य कैसा-कितना उज्जवल रहेगा।


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