ऐसे तो सभी पार्टिया सभी धर्मो व जाती का हितैषी होने का दावा करती हैं पर पिछले दो दशक से उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती आंबेडकर के दलित जीवन का भरपूर लाभ लेती रहीं, तो एक तरफ लगभग पंद्रह दिन पहले औपचारिक बैठक के बाद आंबेडकर के प्रति उमड़ी भाजपा की श्रद्धा शायद उसी की फोटोकॉपी है तो वही समाजवादी पार्टी ने भी समाजवादी विचारधारा के साथ जाति और धर्म से ऊपर उठकर पिछला लोकसभा चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ कर सभी का दिल जितने की कोशिश की है और काफी हद तक सफल भी रही है । सबका साथ, सबका विकास के नारे को सामने रख सत्ता में आने वाली भाजपा अगर जाति विशेष की राजनीति करती है तो यह बदला होगा या बदलाव, समझना बिल्कुल आसान है। एक तरफ आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा की राजनीति और दूसरी तरफ आंबेडकर के प्रति लगाव, यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि भाजपा अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। वह खुद नहीं समझ पा रही है कि तवज्जो किसको दे? जातिवाद को या विकासवाद को? ऐसे में राजनैतिक पार्टियों को जनता की सोच को पहचानना होगा उन्हें 2019 की सत्ता का लोभ त्यागते हुए जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही दलित व पिछड़े वर्ग को भी अपने वास्तविक हितैषी को पहचानना चाहिए और जरूरत पड़ने पर जाति धर्म से ऊपर उठ कर समर्थन उसी का करना चाहिए जो उसके विकास के प्रति समर्पित हो ।



