आज देश में बेरोजगार नौजवानों की संख्या करोड़ों में है। कुछ वर्षों पूर्व तक युवाओं अपने करियर और भविष्य को लेकर एक खास तरह की बेचैनी देखी जाती थी।तब की सरकारें भी बेरोजगारी दूर करने के लिए आधे-अधूरे मन से प्रयास करती नजर आती थीं उसी का नतीजा होता था कि थोड़े-से नौजवानों को अपने अरमानों को पूरा करने का अवसर मिल पाता था और बाकी को टूटे अरमानों के साथ उम्मीद का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन जैसे-जैसे वैश्वीकरण के तहत देश में नई-नईआर्थिक नीतियां लागु की जाती रही, वैसे-वैसे युवाओं के अरमान टूटने लगे। इससे पहले युवाओं में असंतोष से उपजा गुस्सा विकराल रूप लेता, व्यवस्था ने सोशल मीडिया को जन्म दे दिया। बहुराष्ट्रीय कंपनियां सोशल मीडिया के जरिए सिर्फ अरबों-खरबों का मुनाफा ही नही कमाया बल्कि करोड़ों बेरोजगार नौजवानों के गुस्से को ठंडा करने का काम किया और ऐसे मौके का कुछ राजनैतिक पार्टियों ने बखूबी भुनाया और उन्हें असल समस्याओं से भटका कर अंधविश्वास, ढोंग-पाखंड, धार्मिक द्वेष और फर्जी देशभक्ति में व्यस्त करने का काम करने लगीं हैं।
राजनैतिक पार्टियाँ और सरकारें बेरोजगार युवाओं को व्यस्त रखने में सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग कर रही है।सरकारें फोन और नेट पैक आवेदन शुल्क से भी सस्ते करके सभी तक इसकी पहुंच को सुनिश्चित कर रहीं है और इसमें सफल भी हो रही हैं। अब युवाओं के बीच बेरोजगारी के बजाय सोशल मीडिया द्वारा परोसी गई अफवाहों, धारणाओं, पूर्वाग्रहों, धार्मिक और राष्ट्रीय उन्माद से लैस आधे अधूरे और बनावटी ज्ञान की चर्चा होती है। आशा है कि जल्द ही युवाओं के दिमाग से यह भ्रम हटेगा और वे अपने भविष्य को उज्वलित करने और अपने अरमानों को पूरा करने के लिए संघर्ष की शुरुआत के साथ साथ सुरक्षित लोकतंत्र का चयन करेंगे !



